By: Kanhaiya Bhardwaj
वो खेतान मार्केट का समा, बोम्बे भेल पुरी की चाट,
वो केन्डी की आइस्क्रीम, वह उस्मे थी कुच बात.
वो कोज़ी की मीठाइ, वो बसंत वीहर का दोसा
वो चने के साथ लीट्ठी और शालीमार का समोसा.
वो बाइक का सफ़र, वो बोरीग रोड की हवा,
वो बोटानीकल गार्डेन की रौनक और रजेन्दर नगर क समा.
वो गान्धी मैदन मे कीर्केट और हार्ने पे झग्रा,
वो कंकर्बाघ के मुहल्ले और मोहल्लो मे भटक्ना,
याद आती है वो पट्ना.
वो जन्वरी की काढाके की शर्दी, वो बारीशो के महीने,
वो गर्मी के दीन, जब छुठते थे पसीनेय.
वो दशेह्रे की धूम, वो छ्ठ मे शर्धा,
वो होली की मश्ती, वो दोश्तो की टोली,
वो दीवली के पठाखे और जन्मश्ट्मी की रोली.
वो सब्जी बाघ की गलीया, वो नोर्टेडाम, कोन्वेन्ठ की लर्कीया.
वो रीजेण्ट की बाल्कोनी और वो अशोक क साऊण्ड,
वो पट्ना कौलेज की कुरीयं और उन्की जोरीयं,
वो मौर्या मे बैठ्ना और डाक्बंग्ले पे पोलीस का पकर्ना,
हम्को याद आती है वो पट्ना.
wo khetan market ka sama,
wo candies ki ice cream, wah usme thi kuch baat.
wo cozy ki mithai, wo basant vihar ka dosa
wo chane ke saath litti aur saalimaar ka samosa.
wo bike ka safar, wo boring road ki hawa,
wo botanical garden ki raunak aur rajendra nagar ka sama.
wo january ki kadake ki sardi, wo baarishon ke mahiney,
wo garmi ke din, jab chhutate they paseeney.
wo holi ki masti, wo doston ki toli,
wo diwali ke patakhe aur janmashtmi ki roli.
wo rejent ki balcony aur wo ashoka ka sound,
wo
wo maurya mein baithna aur dakbangle pe police ka pakarna,
